HighLights
- डोनाल्ड ट्रंप ने दीएगो गार्सिया को लेकर ब्रिटेन पर साधा निशाना
- ग्रीनलैंड के बाद हिंद महासागर में बढ़ी अमेरिकी दिलचस्पी
- भारत की रणनीतिक भूमिका और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली।
Donald Trump Eyes Diego Garcia: ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद के बाद अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नजर भारत के पड़ोस में स्थित रणनीतिक द्वीप दीएगो गार्सिया पर टिक गई है। हिंद महासागर में मौजूद यह द्वीप न केवल अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा है, बल्कि चीन को काउंटर करने के लिहाज से भी बेहद अहम माना जाता है। ट्रंप ने हाल ही में ब्रिटेन के उस फैसले की तीखी आलोचना की है, जिसमें चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने पर सहमति बनी है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ’ पर ब्रिटेन के इस कदम को “पूर्ण कमजोरी” और “बड़ी मूर्खता” बताया। उन्होंने कहा कि दीएगो गार्सिया जैसे रणनीतिक द्वीप को सौंपने से चीन और रूस जैसी ताकतों को गलत संदेश जाएगा। ट्रंप ने इसी तर्क को ग्रीनलैंड पर कब्जे की अपनी मांग से जोड़ते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ऐसे क्षेत्रों पर नियंत्रण जरूरी है।
दीएगो गार्सिया क्यों है इतना अहम?
दीएगो गार्सिया चागोस द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है, जहां 1960 के दशक से अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा मौजूद है। यह बेस मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ्रीका में अमेरिकी सैन्य अभियानों का प्रमुख केंद्र रहा है। 1965 में ब्रिटेन ने चागोस को मॉरीशस से अलग कर ‘ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी’ बनाया था, जिसके बाद हजारों मूल निवासियों को वहां से हटाया गया।
मई 2025 में ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच हुए समझौते के तहत चागोस की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने का फैसला लिया गया, जबकि दीएगो गार्सिया पर 99 साल की लीज ब्रिटेन को दी गई। इसके बदले ब्रिटेन मॉरीशस को हर साल करीब 13.6 करोड़ डॉलर देगा। हालांकि यह समझौता अभी ब्रिटिश संसद में रैटिफिकेशन के चरण में है।
भारत का नाम नहीं, लेकिन असर भारत पर
हालांकि ट्रंप ने अपने बयान में भारत का नाम नहीं लिया, लेकिन भारत इस समझौते का खुलकर समर्थन कर रहा है। नई दिल्ली लंबे समय से मॉरीशस के डिकोलोनाइजेशन प्रयासों के साथ खड़ी रही है। भारत ने मॉरीशस को करीब 68 करोड़ डॉलर का सहयोग पैकेज दिया है, जिसमें चागोस क्षेत्र में मरीन प्रोटेक्टेड एरिया, सैटेलाइट स्टेशन और हाइड्रोग्राफिक सर्वे शामिल हैं।
भारत हिंद महासागर को अपने प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता है और यहां बढ़ते सैन्यीकरण, खासकर चीन की मौजूदगी को लेकर सतर्क रहा है। ऐसे में ट्रंप का यह बयान न सिर्फ भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाता है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता पर भी सवाल खड़े करता है।
भारत के लिए कितना खतरनाक?
विशेषज्ञों के मुताबिक, ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी भारत के लिए सीधे खतरे का संकेत नहीं है, लेकिन यह साफ करता है कि अमेरिका हिंद महासागर में अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहता है। भारत-अमेरिका के रक्षा संबंध भले ही मजबूत हों, लेकिन इस तरह के बयानों से भविष्य में कूटनीतिक असहजता बढ़ सकती है। ग्रीनलैंड के बाद दीएगो गार्सिया को लेकर उठा विवाद दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन क्षेत्रीय संप्रभुता के मुद्दों पर टकराव से पीछे हटने वाला नहीं है।