मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और वैश्विक ऊर्जा संकट के खतरे के बीच अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट दे दी है। यह राहत केवल उन तेल टैंकरों के लिए लागू होगी जो पहले से समुद्र में हैं और भारत की ओर आ रहे हैं। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।
मिडिल ईस्ट तनाव के बीच ऊर्जा संकट का खतरा
इस समय मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण तेल सप्लाई पर खतरा मंडरा रहा है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर तेल आपूर्ति बाधित हुई तो वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। इसमें खाड़ी देशों की अहम भूमिका है और बड़ी मात्रा में तेल होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आता है। अगर इस समुद्री मार्ग पर संकट बढ़ता है तो भारत समेत कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका ने भारत को 30 दिन की छूट क्यों दी
अमेरिका का यह फैसला पूरी तरह रणनीतिक माना जा रहा है। दरअसल भारत ने पहले ही बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीद लिया था और कई टैंकर समुद्र में यात्रा कर रहे हैं।
अगर इन टैंकरों को अचानक रोक दिया जाता तो भारतीय रिफाइनरियों को तुरंत नए सप्लायर ढूंढने पड़ते। इससे तेल की कीमतों में अचानक उछाल आ सकता था और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती थी।
इसी वजह से अमेरिका ने फैसला लिया कि जो तेल खेप पहले से रास्ते में हैं उन्हें भारत तक पहुंचने की अनुमति दी जाए।
समुद्र में कहां हैं रूसी तेल के टैंकर
रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 20 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल पहले ही खरीदा जा चुका है। यह तेल लेकर कई टैंकर अभी समुद्र में हैं और मार्च से अप्रैल के बीच भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने वाले हैं।
भारतीय रिफाइनरियां जैसे IOCL, BPCL, HPCL और MRPL इन टैंकरों की डिलीवरी पर निर्भर हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी अतिरिक्त खेप की मांग की है ताकि सप्लाई स्थिर बनी रहे।
अमेरिका की असली रणनीति क्या है
अमेरिका का मकसद सिर्फ बाजार को स्थिर रखना नहीं है। वाशिंगटन चाहता है कि भविष्य में भारत रूसी तेल की जगह अमेरिकी क्रूड तेल ज्यादा खरीदे।
अमेरिका फिलहाल दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में शामिल है और वह भारत जैसे बड़े बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है। इसलिए फिलहाल 30 दिन की छूट देकर ऊर्जा बाजार में झटका टालने की कोशिश की गई है।
आगे क्या हो सकता है
विशेषज्ञों के अनुसार यह राहत अस्थायी है। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो तेल बाजार में अनिश्चितता बनी रह सकती है।
भारत भी अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव कर सकता है और अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की नीति को और मजबूत कर सकता है। आने वाले महीनों में वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार दोनों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।