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दुनिया पर फिर ‘लॉकडाउन’ का खतरा? ऊर्जा संकट ने बढ़ाई चिंता!

ऊर्जा संकट से दुनिया में बढ़ी चिंता

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz पर संकट के चलते पूरी दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि कई देशों ने ‘लॉकडाउन जैसे’ उपायों की तैयारी शुरू कर दी है।

तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल

रिपोर्ट्स के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतें 112 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। वहीं United States में गैसोलीन की कीमत 5 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है।

तेल की कीमतों में इस उछाल का असर ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की चीजों पर पड़ रहा है, जिससे महंगाई बढ़ती जा रही है।

उड़ानें कम, देशों में राशनिंग शुरू

ऊर्जा संकट का असर अब सीधे लोगों की जिंदगी पर दिखने लगा है। United Airlines ने अपनी उड़ानों में 5% तक कटौती कर दी है।

वहीं Japan और South Korea जैसे देशों में ईंधन राशनिंग शुरू हो चुकी है। Bangladesh, Philippines और Sri Lanka में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं।

क्या फिर लौटेगा ‘लॉकडाउन’ जैसा दौर?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो देशों को कोविड जैसी पाबंदियां लागू करनी पड़ सकती हैं।

International Energy Agency ने ‘Sheltering from Oil Shocks’ नाम से 10-सूत्रीय योजना जारी की है, जिसमें ऊर्जा खपत कम करने के उपाय बताए गए हैं।

IEA की योजना में क्या शामिल?

IEA की योजना में कई बड़े कदम शामिल हैं:

  • वाहनों के लिए सीमित उपयोग
  • हाईवे पर स्पीड लिमिट
  • हवाई यात्रा में कटौती
  • वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा
  • इलेक्ट्रिक उपकरणों का इस्तेमाल

इन उपायों का मकसद ऊर्जा की खपत कम करना है, लेकिन इसका असर आम जीवन पर भी पड़ेगा।

कई देशों ने शुरू की तैयारी

Australia जैसे देशों ने गैर-जरूरी यात्राओं पर रोक लगाने की तैयारी शुरू कर दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर संकट लंबा चला, तो डिजिटल परमिट सिस्टम लागू हो सकता है, जिसमें लोगों की यात्रा और ऊर्जा उपयोग को नियंत्रित किया जाएगा।

भारत पर भी बढ़ सकता है असर

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है। ऐसे में ऊर्जा संकट का असर भारत पर भी पड़ सकता है।

हालांकि, भारत सरकार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और सप्लाई चेन को मजबूत करने में जुटी है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरा

ऊर्जा संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर भी असर डाल सकता है।

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