नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) को लेकर देश और विदेश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अमेरिकी सांसद राइली मूर द्वारा सोशल मीडिया पर इस विधेयक को लेकर चिंता जताए जाने के बाद भारत में विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विश्व हिंदू परिषद (VHP), विपक्षी दलों और सत्ता पक्ष के नेताओं ने इस मुद्दे पर अलग-अलग रुख अपनाया है।
क्या है पूरा विवाद?
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट साझा करते हुए दावा किया कि प्रस्तावित FCRA संशोधनों से भारत में चर्च, धार्मिक संस्थाओं, चैरिटी संगठनों, स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द या समाप्त होता है, तो उसकी संपत्तियों पर सरकार का नियंत्रण हो सकता है। मूर ने इसे भारत में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बताते हुए चिंता व्यक्त की।
VHP ने आरोपों को बताया तथ्यहीन
अमेरिकी सांसद के बयान पर विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा कि राइली मूर के दावे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि प्रस्तावित संशोधनों की किस धारा में चर्च या धार्मिक संस्थानों पर सरकारी कब्जे का उल्लेख किया गया है। VHP का कहना है कि नया कानून केवल विदेशी फंड के कथित दुरुपयोग, अवैध गतिविधियों और नियमों के उल्लंघन पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाया जा रहा है।
संगठन ने संबंधित एजेंसियों से भ्रामक जानकारी फैलाने वालों पर नजर रखने की भी मांग की।
विपक्ष ने कहा- भारत के आंतरिक मामलों में दखल न दे अमेरिका
वामपंथी दल CPI(M) के राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने कहा कि भारत के घरेलू मामलों में किसी विदेशी सांसद का हस्तक्षेप उचित नहीं है। हालांकि उन्होंने FCRA कानून में प्रस्तावित संशोधनों पर अपनी असहमति भी दोहराई। उनका कहना है कि इस कानून के प्रभाव को लेकर उनकी पार्टी पहले से सवाल उठाती रही है, लेकिन इस विषय पर अंतिम निर्णय भारत की संसद को ही लेना चाहिए।
सत्ता पक्ष का दावा- विदेशी फंड के दुरुपयोग पर लगेगी रोक
शिवसेना (शिंदे गुट) के नेता संजय निरुपम ने प्रस्तावित संशोधनों का समर्थन करते हुए कहा कि यह कानून विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य नियमों के तहत आने वाले विदेशी चंदे की निगरानी मजबूत करना और पारदर्शिता बढ़ाना है। उनका दावा है कि इससे संदिग्ध गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने में मदद मिलेगी।
संसद में चर्चा पर टिकी नजर
प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक पर अभी संसद में विस्तृत चर्चा होना बाकी है। इस बीच देश में इसे लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस पर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। आने वाले दिनों में संसद में होने वाली बहस और सरकार द्वारा दिए जाने वाले स्पष्टीकरण पर सभी की नजर बनी रहेगी।