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पश्चिम बंगाल मतगणना विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने TMC की याचिका पर अतिरिक्त आदेश देने से किया इनकार!

मतगणना से पहले बड़ा कानूनी घटनाक्रम

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की मतगणना से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने मतगणना में केंद्रीय और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की तैनाती को चुनौती देने वाली याचिका पर कोई अतिरिक्त आदेश देने से इनकार कर दिया।

अदालत ने साफ कहा कि फिलहाल नए निर्देश जारी करने की जरूरत नहीं है और निर्वाचन आयोग के आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया गया है।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग मतगणना कर्मचारियों के चयन के लिए केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पूल का उपयोग कर सकता है। केवल इस आधार पर इस व्यवस्था को नियमों के खिलाफ नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मतगणना के दौरान सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे, इसलिए पारदर्शिता को लेकर अतिरिक्त संदेह की गुंजाइश सीमित है।

TMC ने क्या उठाए सवाल?

तृणमूल कांग्रेस की ओर से दलील दी गई कि चुनाव आयोग ने केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती का आधार स्पष्ट नहीं किया। पार्टी ने यह भी कहा कि संबंधित परिपत्र पहले जारी हुआ था, लेकिन इसकी जानकारी उन्हें काफी देर से मिली। सुनवाई के दौरान पार्टी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। हालांकि अदालत ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि नियुक्ति राज्य या केंद्र—किसी भी स्रोत से हो सकती है।

चुनाव आयोग का आश्वासन दर्ज

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के उस बयान को रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें कहा गया कि 13 अप्रैल 2026 के सर्कुलर को “पूर्ण भावना और आशय” के साथ लागू किया जाएगा। यानी फिलहाल मतगणना की पूरी प्रक्रिया आयोग के मौजूदा दिशा-निर्देशों के तहत ही आगे बढ़ेगी।

4 मई को होगी मतगणना

पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतगणना 4 मई को होनी है। इस बीच यह मामला राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील माना जा रहा है।

यह विवाद उस निर्देश के बाद बढ़ा जिसमें कहा गया था कि हर मतगणना टेबल पर सुपरवाइजर या असिस्टेंट में से कम से कम एक कर्मचारी केंद्र सरकार या पीएसयू से होना चाहिए।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल मतगणना की तैयारियों को कानूनी राहत मिल गई है। हालांकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी रहने के संकेत हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि केंद्रीय कर्मचारियों की तैनाती को प्रथम दृष्टया अवैध नहीं माना जा सकता। अंतिम रूप से अब नजरें 4 मई की मतगणना पर टिकी हैं।

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