पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार को बड़ा संवैधानिक घटनाक्रम देखने को मिला। विधानसभा चुनाव में हार के बाद इस्तीफा न देने के फैसले के बीच राज्यपाल ने संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए विधानसभा भंग कर दी। इसके साथ ही ममता बनर्जी मुख्यमंत्री पद पर नहीं रहीं और उनका मंत्रिमंडल भी प्रभावी रूप से समाप्त हो गया। इस फैसले ने राज्य की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है।
इस्तीफे पर अड़ी थीं ममता बनर्जी
चुनाव नतीजों के बाद ममता बनर्जी ने साफ कहा था कि वह इस्तीफा नहीं देंगी। तृणमूल कांग्रेस की बैठक में उन्होंने चुनाव परिणामों पर सवाल उठाते हुए दावा किया था कि उनकी हार जनादेश की नहीं बल्कि साजिश की देन है। उन्होंने अपने विधायकों से एकजुट रहने की अपील भी की थी। इसी बयान के बाद बंगाल की राजनीति में तनाव और बढ़ गया था।
राज्यपाल ने किस संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल किया
राजभवन की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174 की उपधारा 2 के खंड (b) के तहत लिया गया। इसी प्रावधान के आधार पर पश्चिम बंगाल विधानसभा को 7 मई 2026 से भंग घोषित किया गया। विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने और नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू होने के कारण यह कदम उठाया गया।
15 साल का सत्ता अध्याय खत्म
इस फैसले के साथ पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 15 साल पुराने शासन का अध्याय समाप्त हो गया। हालिया चुनाव में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है और अब नई सरकार के गठन की तैयारी तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन माना जा रहा है।

नई सरकार के गठन की तैयारी
अब सबकी नजर भाजपा विधायक दल की बैठक और नए मुख्यमंत्री के नाम पर टिकी है। कोलकाता में जल्द ही नई सरकार के गठन की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक शपथ ग्रहण समारोह भी जल्द आयोजित किया जा सकता है।