चीन की ओर से तिब्बत के पठार पर ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जा रहे विशाल हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। ब्रह्मपुत्र नदी को चीन में यारलुंग त्सांगपो के नाम से जाना जाता है। चीन का यह प्रोजेक्ट दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल बताया जा रहा है। अब चीन के वैज्ञानिकों की एक रिसर्च में परियोजना वाले क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय का यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से बेहद संवेदनशील है। ऐसे में किसी बड़े भूकंप या भूगर्भीय हलचल की स्थिति में बांध और उसके जलाशय से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं। हालांकि, संभावित नुकसान को लेकर किए जा रहे आकलन फिलहाल विशेषज्ञों की आशंकाओं और उपलब्ध शोध पर आधारित हैं।
चीन के वैज्ञानिकों की रिसर्च ने बढ़ाई चिंता
नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के प्रोफेसर एमेरिटस ब्रह्मा चेल्लानी ने प्रोजेक्ट सिंडिकेट में प्रकाशित एक लेख में इस परियोजना से जुड़े जोखिमों का जिक्र किया है। उन्होंने चीन के एक चीनी भाषा के जर्नल में प्रकाशित रिसर्च पेपर का हवाला देते हुए बताया कि बांध के आसपास का क्षेत्र गंभीर भूगर्भीय चुनौतियों वाला है।
रिसर्च में जमीन की संरचना, चट्टानों और मिट्टी के बीच कमजोर पकड़ तथा फॉल्ट में हलचल की संभावनाओं से जुड़े खतरे बताए गए हैं। वैज्ञानिकों ने जलाशय के आसपास ढलानों को मजबूत करने और परियोजना के कुछ हिस्सों के डिजाइन की समीक्षा जैसे उपाय सुझाए हैं।
भूकंप आया तो क्या हो सकता है?
तिब्बती पठार हिमालय के बेहद संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है। इस इलाके में अतीत में बड़े भूकंप आ चुके हैं। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता यह है कि किसी बड़े भूकंप से बांध या उससे जुड़े बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा तो स्थिति गंभीर हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक गंभीर स्थिति में जलाशय से अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आने की आशंका पैदा हो सकती है। इसे लेकर ही कुछ विश्लेषणों में ‘वॉटर बम’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि बांध टूटना निश्चित है, बल्कि यह एक संभावित चरम परिस्थिति का आकलन है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ब्रह्मपुत्र?
ब्रह्मपुत्र भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण नदी है। इसके पानी पर खेती, मत्स्य पालन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और नदी से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र निर्भर करते हैं। नदी भारत से आगे बांग्लादेश में प्रवेश करती है और वहां भी जल संसाधन के लिहाज से इसका बड़ा महत्व है।
बांध बनने से नदी के प्राकृतिक बहाव, पानी की मात्रा और तलछट यानी गाद के प्रवाह में बदलाव की आशंका जताई जा रही है। गाद नदी किनारे की जमीन को पोषक तत्व उपलब्ध कराने और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बाढ़ और खेती पर भी पड़ सकता है असर?
विशेषज्ञों की चिंता केवल बांध टूटने की संभावित स्थिति तक सीमित नहीं है। बड़े बांधों के संचालन से नदी के बहाव और तलछट के प्राकृतिक पैटर्न में बदलाव आ सकता है। इसका असर नदी के आसपास के पर्यावरण, आर्द्रभूमियों और कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है।
अगर किसी आपात स्थिति में जलाशय से अचानक पानी छोड़ा जाता है, तो भारत और बांग्लादेश के निचले इलाकों में बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव बांध के संचालन, मौसम, नदी के प्रवाह और किसी संभावित आपदा की प्रकृति पर निर्भर करेगा।
पानी को लेकर भारत-चीन की चिंता
ब्रह्मपुत्र को लेकर भारत और चीन के बीच लंबे समय से चिंता रही है। तिब्बत का पठार एशिया की कई प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र है। भारत की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर रही है कि चीन द्वारा ऊपरी हिस्से में बनाई जा रही परियोजनाओं से नदी के बहाव और पानी से जुड़े आंकड़ों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
जल विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल भी उठता रहा है कि सीमा पार बहने वाली नदियों के मामले में पारदर्शिता और रियल टाइम जल आंकड़ों का आदान-प्रदान कितना महत्वपूर्ण है।
सबसे बड़ा सवाल—सुरक्षा और पारदर्शिता
ब्रह्मपुत्र पर चीन की विशाल परियोजना को लेकर सामने आई चिंताएं पर्यावरण, भूकंपीय सुरक्षा और सीमा पार जल प्रबंधन—तीनों से जुड़ी हैं। चीन के वैज्ञानिकों द्वारा भूगर्भीय जोखिमों पर शोध किए जाने के बाद इस परियोजना की सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर बहस और तेज हो सकती है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस परियोजना से भारत में निश्चित रूप से कोई बड़ी आपदा आएगी। लेकिन ब्रह्मपुत्र जैसी अंतरराष्ट्रीय नदी पर इतनी बड़ी परियोजना होने के कारण भारत और बांग्लादेश के लिए इसके संभावित प्रभावों पर लगातार निगरानी और पारदर्शी जल-सूचना साझा करना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।