ईरान में आर्थिक संकट के खिलाफ भड़के जनआक्रोश ने गंभीर रूप ले लिया है। पिछले 10 दिनों से जारी सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा में मरने वालों की संख्या कम से कम 35 तक पहुंच गई है। अमेरिकी ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी (HRANA) के मुताबिक, अब तक 1,200 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है। मृतकों में 29 प्रदर्शनकारी, चार बच्चे और सुरक्षा बलों के दो सदस्य शामिल बताए गए हैं। हालांकि, कड़े प्रतिबंधों और इंटरनेट बंदी के चलते सटीक आंकड़ों की पुष्टि मुश्किल बनी हुई है।
ईरान के कई बड़े शहरों—तेहरान, इस्फ़हान, बाबोल, काज़्विन और बोजनॉर्ड—में हालात तनावपूर्ण हैं। 31 में से 27 प्रांतों तक फैले इस आंदोलन में 88 शहरों के 257 स्थानों पर रैलियां, सड़क जाम और श्रमिक हड़तालें दर्ज की गई हैं। करीब 17 विश्वविद्यालयों में छात्रों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सुरक्षा एजेंसियों ने प्रमुख इलाकों में कड़ा पहरा बढ़ा दिया है और कई क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं सीमित कर दी गई हैं।
इधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी है। ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए ट्रंप ने कहा कि यदि ईरान शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या करता रहा, तो अमेरिका “उनकी मदद के लिए आएगा।” हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह मदद किस रूप में होगी। वेनेजुएला में हालिया अमेरिकी कार्रवाई के बाद ट्रंप के इस बयान को संभावित सैन्य या कूटनीतिक दखल के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
ईरानी पक्ष से भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अर्ध-सरकारी फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, प्रदर्शनों के दौरान करीब 250 पुलिसकर्मी और रिवोल्यूशनरी गार्ड की स्वयंसेवी शाखा ‘बसिज फोर्स’ के 45 सदस्य घायल हुए हैं। सरकार ने अशांति पर कोई समग्र आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में मौजूदा संकट की जड़ें आर्थिक बदहाली में हैं। जून में इजरायल के साथ 12 दिनों के युद्ध और लंबे समय से लगे प्रतिबंधों के चलते मुद्रा ‘रियाल’ बुरी तरह गिर चुकी है—दिसंबर में विनिमय दर 14 लाख रियाल प्रति डॉलर तक पहुंच गई। महंगाई, बेरोजगारी और रोजमर्रा की मुश्किलों ने जनता का गुस्सा सड़कों पर ला दिया है। ऐसे में ट्रंप की चेतावनी और अमेरिका-इजरायल के संभावित विकल्पों पर विचार क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकते हैं।