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अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ताइवान पर चीन का बढ़ता दबाव!

मौजूदा वैश्विक हालात में एशिया का भू-राजनीतिक संतुलन तेजी से बदलता नजर आ रहा है। एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ने मिडिल ईस्ट को अस्थिर कर रखा है, वहीं दूसरी ओर चीन ने इस मौके का फायदा उठाते हुए ताइवान के आसपास अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दी हैं।

ताइवान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, हाल ही में चीन ने 19 लड़ाकू विमान, 9 नौसैनिक जहाज और 2 सरकारी जहाज ताइवान के आसपास तैनात किए। इनमें से 13 फाइटर जेट्स ने ताइवान स्ट्रेट की मिडियन लाइन पार करते हुए उसके एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन (ADIZ) में प्रवेश किया। यह कदम क्षेत्र में तनाव को और बढ़ाने वाला माना जा रहा है।

‘भेड़िए’ की रणनीति से दबाव बना रहा चीन

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस समय सीधे युद्ध से बचते हुए ‘प्रेशर बिल्ड-अप’ की रणनीति अपना रहा है। लगातार सैन्य अभ्यास और घेराबंदी के जरिए ताइवान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा रहा है। इससे पहले भी चीन ने 15 सैन्य विमान भेजे थे, जिनमें से 11 ने मिडियन लाइन पार की थी।

यह रणनीति किसी शिकारी के धीरे-धीरे शिकार को घेरने जैसी बताई जा रही है, जिसे सैन्य विश्लेषक ‘ग्रे ज़ोन वॉरफेयर’ का हिस्सा मानते हैं।

चीन-ताइवान विवाद की जड़ क्या है?

दरअसल, चीन लंबे समय से ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखता है। यही विवाद दोनों के बीच तनाव का मुख्य कारण है।

चीन कई बार संकेत दे चुका है कि वह ताइवान को अपने नियंत्रण में लाने के लिए सैन्य विकल्प का इस्तेमाल कर सकता है।

ईरान मुद्दे पर शांत क्यों है चीन?

दिलचस्प बात यह है कि जहां चीन और ईरान के रिश्ते मजबूत माने जाते हैं, वहीं अमेरिका के साथ तनाव के बावजूद चीन ने ईरान के पक्ष में कोई बड़ा सैन्य कदम नहीं उठाया।

शी जिनपिंग ने हाल ही में अमेरिका के साथ बातचीत में ताइवान को सबसे बड़ा मुद्दा बताया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि ताइवान पर किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को चीन बर्दाश्त नहीं करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन फिलहाल अपनी प्राथमिकता ताइवान को बना रहा है और इसलिए ईरान के मुद्दे पर सीमित प्रतिक्रिया दे रहा है।

क्या बढ़ सकता है वैश्विक तनाव?

वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले समय में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। यदि चीन अपनी सैन्य गतिविधियों को और तेज करता है, तो यह न केवल ताइवान बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है।

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