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कश्मीर से उत्तराखंड तक सूनी पहाड़ियां: दिसंबर-जनवरी में क्यों नहीं गिरी बर्फ, क्या आने वाला है बड़ा जलवायु संकट?

Why No Snowfall in Himalayas This Winter | Climate Crisis Explained

दिसंबर और जनवरी का महीना आते ही हिमालय की चोटियों पर बर्फ की सफेदी छा जाना सामान्य बात होती है, लेकिन इस बार कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की पहाड़ियां सूनी नजर आईं। न बर्फ, न बारिश और न ही ठंड की वह तीव्रता, जिसकी उम्मीद हर साल की जाती है। इससे पर्यटक हैरान हैं, किसान परेशान और वैज्ञानिक गंभीर चिंता में हैं।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़े बताते हैं कि यह स्थिति महज एक मौसमी गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक बड़े जलवायु संकट (Climate Crisis in Himalayas) की ओर इशारा कर रही है।

IMD के आंकड़े क्या कहते हैं?

  • उत्तराखंड में दिसंबर-जनवरी के दौरान लगभग शून्य वर्षा दर्ज की गई
  • हिमाचल प्रदेश में दिसंबर की बारिश 1901 के बाद छठे सबसे निचले स्तर पर
  • जम्मू-कश्मीर में जनवरी में बर्फबारी सामान्य से बेहद कम
  • पूरे उत्तर-पश्चिम भारत में जनवरी के पहले पखवाड़े में सिर्फ 8% सामान्य बारिश

आखिर बर्फबारी क्यों नहीं हुई?

सर्दियों में उत्तर भारत की बारिश और बर्फबारी का मुख्य कारण वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (Western Disturbance) होते हैं, जो भूमध्य सागर और कैस्पियन क्षेत्र से नमी लेकर आते हैं।

लेकिन इस बार:

  • वेस्टर्न डिस्टर्बेंस कमजोर रहे
  • नमी पर्याप्त नहीं थी
  • ट्रफ उथली रही, हवा ऊपर नहीं उठ सकी
  • नतीजतन न कंडेन्सेशन हुआ और न ही बर्फबारी

IMD देहरादून के निदेशक सी.एस. तोमर के अनुसार, सिस्टम तो आए लेकिन “दमदार” नहीं थे।

हिमालयी राज्यों पर क्या असर पड़ा?

कम बर्फबारी का असर सिर्फ पर्यटन तक सीमित नहीं है। इसके दूरगामी परिणाम सामने आ रहे हैं:

  • ग्राउंडवॉटर रिचार्ज नहीं हो पा रहा
  • नदियों को बेस फ्लो नहीं मिल रहा
  • रबी फसलों को जरूरी नमी की कमी
  • जंगलों की मिट्टी सूख रही
  • ग्लेशियर समय से पहले पिघलने के खतरे में

जंगलों में आग क्यों बढ़ रही है?

बर्फ और बारिश की कमी से जंगलों की जमीन सूखी पड़ी है।
Forest Survey of India के अनुसार:

  • उत्तराखंड में 1600+ फायर अलर्ट
  • हिमाचल प्रदेश में करीब 600
  • जम्मू-कश्मीर में लगभग 300 अलर्ट

नमी की कमी जंगलों में आग की सबसे बड़ी वजह बन रही है।

ग्लेशियरों पर मंडराता खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि कम बर्फबारी से ग्लेशियरों का “प्राकृतिक कवर” नहीं बन पा रहा, जिससे वे तेजी से पिघल सकते हैं।
वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक मनीष मेहता के मुताबिक, इससे:

  • ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा
  • नदियों में पानी का डिस्चार्ज घटने की आशंका
  • मैदानी इलाकों तक जल संकट फैल सकता है

क्या फरवरी में बर्फबारी राहत देगी?

वैज्ञानिक मानते हैं कि फरवरी की बर्फ उतनी उपयोगी नहीं होती।
कारण:

  • तापमान ज्यादा होता है
  • बर्फ जल्दी पिघल जाती है
  • जमीन में नमी लंबे समय तक नहीं टिकती

दिसंबर में गिरी बर्फ ही खेती और जलस्रोतों के लिए सबसे फायदेमंद मानी जाती है।

आगे क्या होगा अगर यही ट्रेंड रहा?

अगर आने वाले वर्षों में भी यही हाल रहा तो:

  • गंभीर जल संकट
  • खेती पर सीधा असर
  • जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ेंगी
  • ग्लेशियर सिकुड़ेंगे
  • नदियों का बेस फ्लो घटेगा

यह संकट पहाड़ों से निकलकर मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।

क्या आने वाले दिनों में राहत की उम्मीद है?

IMD के अनुसार 18 से 20 जनवरी के बीच एक नया वेस्टर्न डिस्टर्बेंस सक्रिय हो सकता है, जिससे हल्की बारिश और बर्फबारी संभव है।
हालांकि विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि इससे पूरे सीजन की भरपाई संभव नहीं है।

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