पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress के लिए हालात लगातार मुश्किल होते दिखाई दे रहे हैं। विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी हार के बाद अब पार्टी के भीतर असंतोष और बगावत की खबरें सामने आने लगी हैं।
बुधवार को कोलकाता में आयोजित TMC के विरोध प्रदर्शन में बेहद कम विधायकों की मौजूदगी और दो नगर पालिकाओं में पार्षदों के सामूहिक इस्तीफों ने पार्टी के भीतर दरार की अटकलों को और तेज कर दिया है।
विरोध प्रदर्शन में नहीं पहुंचे अधिकांश विधायक
कोलकाता में अंबेडकर प्रतिमा के पास आयोजित TMC के धरने में पार्टी के 80 विधायकों में से केवल 36 विधायक ही पहुंचे। यह प्रदर्शन पोस्ट-पोल हिंसा, बुलडोजर कार्रवाई और फेरीवालों पर कथित दबाव के खिलाफ आयोजित किया गया था।
लेकिन पार्टी के अपने विधायकों की कम मौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए। माना जा रहा है कि चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
धरने में शामिल प्रमुख नेताओं में Firhad Hakim, Kunal Ghosh और सोवंदेब चट्टोपाध्याय जैसे नेता मौजूद रहे।
नगर पालिकाओं में सामूहिक इस्तीफों से बढ़ी चिंता
उत्तर 24 परगना जिले की दो नगर पालिकाओं में बड़े पैमाने पर इस्तीफों ने TMC नेतृत्व की चिंता और बढ़ा दी है। कांचरापाड़ा नगर पालिका में 24 में से 15 पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया, जबकि हलिशहर में 23 में से 16 पार्षदों ने पद छोड़ दिया।
सूत्रों के मुताबिक चुनाव नतीजों के बाद स्थानीय नेतृत्व को लेकर नाराजगी बढ़ रही थी। नागरिक सुविधाओं और संगठन की कार्यशैली को लेकर भी कई पार्षद असंतुष्ट बताए जा रहे हैं।
पार्टी रणनीति पर उठे सवाल
कालीघाट में हुई पार्टी बैठक में कई नेताओं और विधायकों ने पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाए। नेताओं का कहना था कि केवल बंद कमरों में बैठकर चर्चा करने से जनता का भरोसा वापस नहीं आएगा। इसके लिए पार्टी को सड़क पर उतरकर लोगों के बीच जाना होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी हार के बाद TMC को संगठनात्मक स्तर पर बड़े बदलाव करने होंगे, वरना असंतोष और तेज हो सकता है।
बीजेपी में शामिल होने की अटकलें
इस्तीफा देने वाले कुछ पार्षदों के बीजेपी में शामिल होने की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वहीं TMC नेतृत्व ने फिलहाल पूरे मामले पर चुप्पी साध रखी है।
माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है और ममता बनर्जी को अपनी पार्टी को एकजुट रखने के लिए अब ज्यादा आक्रामक रणनीति अपनानी पड़ सकती है।