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अफगानिस्तान को मिला रूस का साथ, पाकिस्तान-अमेरिका की बढ़ी टेंशन, क्या तालिबान को मिलेंगे मिग-सुखोई और S-400?

मॉस्को में हुए रक्षा सहयोग समझौते ने बदल दिए दक्षिण एशिया के रणनीतिक समीकरण

मॉस्को/काबुल। रूस और तालिबान के बीच बढ़ती नजदीकियों ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कभी सोवियत-अफगान युद्ध में एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे रूस और तालिबान अब रक्षा सहयोग के नए अध्याय की तरफ बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। मॉस्को में आयोजित ‘इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम’ के दौरान दोनों पक्षों के बीच सैन्य सहयोग समझौते को मंजूरी मिलने के बाद पाकिस्तान और अमेरिका की चिंताएं बढ़ गई हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समझौते में सैन्य ट्रेनिंग, हथियारों की मरम्मत, तकनीकी सहायता और रक्षा सहयोग जैसे कई अहम बिंदु शामिल हो सकते हैं। हालांकि रूस और तालिबान ने अभी तक डील का पूरा ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता अफगानिस्तान की सैन्य ताकत को मजबूत कर सकता है।

क्या तालिबान को मिलेंगे रूसी लड़ाकू विमान?

इस रक्षा समझौते के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि क्या रूस भविष्य में अफगानिस्तान को मिग या सुखोई जैसे लड़ाकू विमान उपलब्ध करा सकता है। कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने रूस से आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की मांग की है।

इसके बाद S-400 और पैंटसिर एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि फिलहाल रूस की ओर से ऐसी किसी डील की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस धीरे-धीरे अफगानिस्तान में अपनी सैन्य पकड़ मजबूत करना चाहता है।

पाकिस्तान की क्यों बढ़ी बेचैनी?

पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में लगातार खराब हुए हैं। पाकिस्तान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंकी अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में हमले करते हैं।

इसी वजह से पाकिस्तान कई बार अफगान सीमा के भीतर सैन्य कार्रवाई भी कर चुका है। लेकिन अगर रूस तालिबान को सैन्य तकनीक, ट्रेनिंग और आधुनिक हथियारों की सहायता देता है तो अफगानिस्तान की स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत हो सकती है। इससे पाकिस्तान का दबाव कमज़ोर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रूस की मौजूदगी पाकिस्तान के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकती है, क्योंकि अब अफगानिस्तान केवल सीमित संसाधनों वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि उसे एक बड़ी वैश्विक शक्ति का समर्थन मिलने लगेगा।

अमेरिका भी सतर्क

अमेरिका के लिए भी यह घटनाक्रम बेहद अहम माना जा रहा है। 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया था। लेकिन जुलाई 2025 में रूस द्वारा तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता देने के बाद हालात बदलने लगे।

अब रक्षा सहयोग समझौते ने यह संकेत दे दिया है कि रूस दक्षिण एशिया में फिर से अपनी रणनीतिक भूमिका मजबूत करना चाहता है। इससे अमेरिका की क्षेत्रीय नीतियों पर भी असर पड़ सकता है।

तालिबान को सबसे बड़ा फायदा क्या?

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समझौते से तालिबान को सिर्फ सैन्य सहायता ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय वैधता भी मिल रही है। लंबे समय तक अलग-थलग रहने के बाद अब रूस का समर्थन तालिबान सरकार के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है।

दक्षिण एशिया की राजनीति में रूस-तालिबान की यह नई दोस्ती आने वाले समय में पाकिस्तान, अमेरिका और पूरे क्षेत्र की रणनीति को प्रभावित कर सकती है।

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