ईरान-इजरायल युद्ध के बीच भारत की नजर अब अपने सबसे अहम विदेशी प्रोजेक्ट्स में से एक – Chabahar Port – पर टिकी हुई है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं चाबहार पोर्ट भी संघर्ष की चपेट में न आ जाए।
भारत यहां करीब 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश कर चुका है और रणनीतिक रूप से यह परियोजना बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
क्यों अहम है चाबहार पोर्ट?
चाबहार ईरान का एकमात्र बंदरगाह है जो सीधे हिंद महासागर से जुड़ा है।
यह ओमान की खाड़ी में होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित है और भारत, अफगानिस्तान व मध्य एशिया के लिए व्यापार का महत्वपूर्ण मार्ग है।
भारत यहां शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल का संचालन 10 साल के समझौते के तहत कर रहा है। अभी तक मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह टर्मिनल सुरक्षित है और किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ है।
120 मिलियन डॉलर का निवेश
रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत ने चाबहार के विकास के लिए 120 मिलियन डॉलर के निवेश का वादा पहले ही पूरा कर दिया है।
जनवरी 2026 तक इस परियोजना से जुड़ी भारतीय वित्तीय प्रतिबद्धताएं पूरी हो चुकी हैं।
यह प्रोजेक्ट भारत को पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान और रूस तक पहुंचने का सीधा रास्ता देता है।
भारत की रणनीति: बातचीत और संतुलन
भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने संकेत दिया है कि भारत अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर कायम है।
भारत की योजना:
- कूटनीतिक बातचीत के जरिए निवेश की सुरक्षा
- अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संतुलित संबंध
- क्षेत्रीय तनाव के बीच भारतीय हितों की रक्षा
नई दिल्ली फिलहाल वार्ता के जरिए ऐसी स्थिति बनाना चाहती है जिससे चाबहार में भारत का निवेश और संचालन प्रभावित न हो।
इंटरनेशनल कनेक्टिविटी का हब
चाबहार पोर्ट:
- भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच व्यापार को बढ़ावा देता है
- इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) से जुड़ा है
- मुंबई से रूस के अस्त्रखान पोर्ट तक कार्गो कनेक्टिविटी का अहम लिंक है
युद्ध की स्थिति में यह प्रोजेक्ट भारत की क्षेत्रीय रणनीति के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।