नई दिल्ली: मानसून के दौरान कोयले की सप्लाई प्रभावित होने और बिजली की मांग बढ़ने के बीच भारत के थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले के स्टॉक को लेकर चिंता बढ़ गई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश के करीब 50 थर्मल पावर प्लांट में 2 सितंबर 2026 तक जरूरत के मुकाबले आधे से भी कम कोयला स्टॉक बचा था। मौजूदा स्टॉक सामान्य परिस्थितियों में करीब 9 दिनों तक चलने का अनुमान है।
50 थर्मल प्लांट में 48 प्रतिशत स्टॉक
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के आंकड़ों के अनुसार, करीब 50 थर्मल पावर प्लांट्स में कुल 224 गीगावाट बिजली उत्पादन क्षमता है। इन प्लांट्स के पास 2 सितंबर तक लगभग 28.2 मिलियन टन कोयला उपलब्ध था, जबकि सामान्य आवश्यकता के हिसाब से स्टॉक करीब 58.7 मिलियन टन होना चाहिए।
इस तरह इन प्लांट्स में उपलब्ध कोयला निर्धारित जरूरत का लगभग 48 प्रतिशत बताया गया है। 85 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर के आधार पर यह स्टॉक करीब 9 दिनों तक चलने का अनुमान है।
मानसून में क्यों बढ़ती है कोयले की परेशानी?
भारत में मानसून के दौरान कोयले की खदानों और परिवहन व्यवस्था पर बारिश का असर पड़ सकता है। भारी बारिश के कारण खदानों से उत्पादन, सड़क और रेल परिवहन तथा कोयले की आवाजाही प्रभावित होने की स्थिति बनती है।
ऐसे समय में अगर बिजली की मांग भी अधिक बनी रहती है, तो थर्मल पावर प्लांट्स पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि देशभर में तुरंत बिजली संकट या बड़े पैमाने पर बिजली कटौती होने वाली है। बिजली उत्पादन और कोयले की आपूर्ति की स्थिति लगातार बदल सकती है।
45 प्लांट घरेलू कोयले पर निर्भर
केंद्रीय कोयला मंत्रालय से जुड़ी जानकारी के अनुसार, इन 50 थर्मल पावर प्लांट्स में से 45 घरेलू कोयले पर निर्भर हैं। चार प्लांट आयातित कोयले का इस्तेमाल करते हैं, जबकि एक प्लांट कोयले की धुलाई से निकलने वाले अवशेषों पर निर्भर है।
मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, प्लांट्स में कोयले के स्टॉक की निगरानी की जा रही है और जरूरत के अनुसार प्राथमिकता के आधार पर कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार का प्रयास कोयले की आपूर्ति को जल्द सामान्य करने का है।
थर्मल प्लांट्स को मेंटेनेंस टालने की सलाह
कोयले की उपलब्धता को देखते हुए कुछ थर्मल पावर प्लांट्स के निर्धारित मेंटेनेंस को फिलहाल टालने की बात सामने आई है, ताकि बिजली उत्पादन जारी रखा जा सके। रिपोर्ट के अनुसार, 85 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर के आधार पर सामान्य कोयले की जरूरत करीब 3.1 मिलियन टन प्रतिदिन आंकी जाती है, जबकि वास्तविक जरूरत लगभग 2.4 मिलियन टन प्रतिदिन बताई गई है।
बिजली उपभोक्ताओं पर क्या पड़ेगा असर?
कोयले की सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित रहती है और स्टॉक तेजी से कम होता है, तो थर्मल पावर उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में बिजली की उपलब्धता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि फिलहाल बिजली सप्लाई पर किसी निश्चित बड़े असर की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी।
मानसून कमजोर होने और सितंबर में बारिश कम होने के साथ कोयले की सप्लाई सामान्य होने की उम्मीद रहती है। आने वाले दिनों में कोयले की आपूर्ति, बिजली की मांग और थर्मल प्लांट्स के स्टॉक पर सरकार और बिजली क्षेत्र की नजर बनी रहेगी।