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2029 से पहले UCC लागू करने की तैयारी, संसद के बजाय राज्यों पर क्यों है जोर? समझिए पूरा गणित!

UCC को लेकर केंद्र और राज्यों की भूमिका पर बढ़ी चर्चा

नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code (UCC) को लेकर देश में एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा। उनके बयान के बाद यह सवाल भी चर्चा में है कि अगर UCC पूरे देश के लिए एक समान व्यवस्था का विषय है, तो इसे संसद के बजाय अलग-अलग राज्यों के जरिए लागू करने पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है।

समवर्ती सूची में आते हैं UCC से जुड़े कई विषय

संविधान की समवर्ती सूची में विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और वसीयत जैसे परिवार से जुड़े कई विषय शामिल हैं। इसका मतलब है कि इन विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। यही संवैधानिक व्यवस्था राज्यों को अपने-अपने स्तर पर व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े सुधार करने का रास्ता देती है।

हालांकि, संसद को भी इन विषयों पर देशभर के लिए कानून बनाने का अधिकार है। ऐसे में UCC को लेकर केंद्र और राज्यों, दोनों स्तरों पर कानून बनाने की संवैधानिक गुंजाइश मौजूद है।

21 राज्यों में लागू करने की बात

अमित शाह के बयान के मुताबिक 2029 से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य है। उत्तराखंड पहले ही अपना UCC लागू कर चुका है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में भी इससे संबंधित विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है।

राज्यवार मॉडल अपनाने का एक पहलू यह भी है कि भारत में अलग-अलग क्षेत्रों की सामाजिक और पारंपरिक व्यवस्थाएं अलग हैं। विशेष रूप से आदिवासी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में स्थानीय रीति-रिवाजों और संवैधानिक संरक्षण से जुड़े अलग प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए किसी एक केंद्रीय मॉडल को लागू करने के बजाय राज्यों के स्तर पर कानून और नियम तैयार करने की प्रक्रिया चर्चा में है।

उत्तराखंड बना पहला राज्य

उत्तराखंड ने UCC लागू करके इस दिशा में पहला बड़ा राज्यस्तरीय कदम उठाया। इसके बाद दूसरे राज्यों ने भी अपने-अपने स्तर पर UCC से संबंधित कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू की।

राज्यवार कानूनों में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और कुछ मामलों में लिव-इन रिलेशनशिप जैसे विषयों को शामिल किया गया है। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में कानून का दायरा और प्रावधान एक जैसे होना जरूरी नहीं है।

संविधान में क्या कहता है अनुच्छेद 44?

UCC का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में किया गया है। यह प्रावधान राज्य को पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कहता है। अनुच्छेद 44 मौलिक अधिकारों के अध्याय में नहीं, बल्कि राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल है।

संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति-निर्देशक तत्व शासन के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन्हें अदालत के जरिए सीधे लागू कराने का अधिकार नहीं है। इसलिए UCC को लेकर संवैधानिक उद्देश्य और उसे लागू करने के व्यावहारिक तरीके के बीच बहस बनी हुई है।

UCC पर पहले भी हो चुका है विचार

विधि आयोग ने 2018 में परिवार से जुड़े कानूनों में सुधार पर अपना कंसल्टेशन पेपर जारी किया था। आयोग ने व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों में सुधार और समानता से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की थी। विधि आयोग की वेबसाइट पर UCC से संबंधित 2018 का दस्तावेज और बाद की सार्वजनिक सूचनाएं उपलब्ध हैं।

इसलिए मौजूदा बहस केवल UCC लागू करने तक सीमित नहीं है। इसमें यह भी सवाल शामिल है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में समान नियम किस तरह बनाए जाएं और अलग-अलग समुदायों की संवैधानिक एवं पारंपरिक व्यवस्थाओं का किस तरह ध्यान रखा जाए।

संसद बनाम राज्य: असली सवाल क्या है?

देशभर में एक केंद्रीय कानून बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन समवर्ती सूची के कारण राज्य भी संबंधित विषयों पर कानून बना सकते हैं। इसी वजह से UCC को राज्यवार आगे बढ़ाने का रास्ता संवैधानिक रूप से उपलब्ध है।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अन्य NDA शासित राज्य किस तरह के UCC कानून अपनाते हैं और क्या अलग-अलग राज्यों के मॉडल में समानता रहती है या स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अंतर दिखाई देता है।

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