अन्तर्राष्ट्रीय

UN की विफलता पर फ्रांस को अब समझ आया, ग्रीनलैंड-कनाडा-ताइवान का डर क्यों? जो मोदी 10 साल से कहते रहे

पेरिस | 9 जनवरी 2026
दुनिया इस वक्त एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक संस्थाएं कमजोर पड़ती दिख रही हैं। युद्ध, तनाव और विस्तारवादी नीतियों के बीच अब संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका पर खुलेआम सवाल उठने लगे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने UN की विफलता को लेकर जो चेतावनी दी है, वह वही बात है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले एक दशक से लगातार कहते आ रहे हैं

“जिसकी लाठी, उसकी भैंस” की ओर लौटती दुनिया

पेरिस में फ्रांसीसी राजदूतों को संबोधित करते हुए मैक्रों ने साफ कहा कि दुनिया एक बार फिर “Law of the Strongest” यानी ताकतवर के कानून की ओर बढ़ रही है। उन्होंने आशंका जताई कि

  • क्या ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश होगी?
  • क्या कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनने का खतरा है?
  • क्या ताइवान को पूरी तरह घेर लिया जाएगा?

मैक्रों का यह बयान वैश्विक व्यवस्था में बढ़ते जंगलराज की ओर इशारा करता है, जहां ताकतवर देश कमजोर देशों की संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं।

किस पर था मैक्रों का इशारा?

मैक्रों का निशाना सीधे तौर पर अमेरिकी ट्रंप प्रशासन की आक्रामक नीति पर था। हाल के महीनों में अमेरिका की ओर से

  • खनिज संसाधनों से भरपूर ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की बात
  • डेनमार्क की सुरक्षा क्षमता पर सवाल
  • और सैन्य विकल्पों की धमकी

इन सबने यूरोप समेत पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस तक यह कह चुके हैं कि अमेरिका अपने हितों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की विफलता पर खुला सवाल

मैक्रों ने स्वीकार किया कि बहुपक्षवाद (Multilateralism) अब प्रभावी नहीं रहा।

  • UN सुरक्षा परिषद तब खामोश रहती है जब ताकतवर देश सीमाएं लांघते हैं
  • अंतरराष्ट्रीय नियमों को वही देश तोड़ रहे हैं, जिन्होंने इन्हें बनाया
  • यह स्थिति नव-औपनिवेशिक आक्रामकता (Neo-Colonialism) की ओर इशारा करती है

यानी UN अब सिर्फ एक मूक दर्शक बनकर रह गया है।

जो बात मोदी 10 साल से कह रहे थे

फ्रांस और पश्चिमी देशों को जो आज महसूस हो रहा है, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 से लगातार वैश्विक मंचों पर दोहरा रहे हैं

  • पीएम मोदी ने बार-बार कहा कि UN आज भी 1945 की मानसिकता में जी रहा है
  • यदि सुधार नहीं हुआ, तो UN केवल एक “टॉकिंग शॉप” बनकर रह जाएगा
  • भारत ने हमेशा Reformed Multilateralism की वकालत की

विकासशील देशों की आवाज बना भारत

पीएम मोदी ने G20, BRICS और UN मंचों पर स्पष्ट कहा कि दुनिया केवल कुछ ताकतवर देशों के इशारों पर नहीं चल सकती।
जहां कुछ देश विस्तारवाद और दबाव की भाषा बोल रहे हैं, वहीं भारत ने
“वसुधैव कुटुंबकम” और Rules-Based World Order का संदेश दिया है।

आज मैक्रों का यह कहना कि “UN में दोबारा निवेश जरूरी है”, दरअसल मोदी के विजन की अंतरराष्ट्रीय स्वीकारोक्ति मानी जा रही है।

क्या बदल पाएगा विश्व व्यवस्था?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि UN में ठोस सुधार नहीं हुए, तो

  • ग्रीनलैंड
  • ताइवान
  • यूक्रेन जैसे संकट
    और बढ़ेंगे।
    यह वक्त सिर्फ चिंता जताने का नहीं, बल्कि वैश्विक संस्थाओं को मजबूत करने का है—ठीक वैसे ही, जैसा भारत सालों से कहता आ रहा है।

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