अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई बहुप्रतीक्षित कूटनीतिक वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई। लगभग 21 घंटे तक चली इस मैराथन बातचीत से दुनिया को ऊर्जा संकट और क्षेत्रीय तनाव में राहत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अंत में निराशा हाथ लगी। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच समझौता नहीं हो सका।
परमाणु मुद्दा बना सबसे बड़ा रोड़ा
इस वार्ता का सबसे अहम मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम था। अमेरिका चाहता था कि ईरान स्थायी रूप से परमाणु हथियार न बनाने का वादा करे। लेकिन ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए साफ इनकार कर दिया। यही मतभेद बातचीत टूटने की सबसे बड़ी वजह बना।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी टकराव
रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद सामने आए। अमेरिका इस क्षेत्र में सुरक्षा भूमिका चाहता था, जबकि ईरान इसे अपने नियंत्रण का मामला मानता है। इस विवाद ने वैश्विक तेल आपूर्ति पर चिंता बढ़ा दी है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता भी नाकाम
इस वार्ता की मेजबानी पाकिस्तान ने की और उसने मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पूरी कोशिश की। लेकिन दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास के कारण कोई साझा समाधान नहीं निकल सका।
ऊर्जा संकट पर गहराया असर
दुनिया पहले से ही तेल और गैस संकट से जूझ रही है। ऐसे में इस वार्ता के विफल होने से वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल सप्लाई होता है, जिससे इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।
अमेरिका की सैन्य चाल से बढ़ा तनाव
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज कर दी हैं। अमेरिकी नौसेना के जहाजों को वहां तैनात किया गया है, जो बारूदी सुरंगों को हटाने के मिशन पर हैं। इसे वैश्विक व्यापार की सुरक्षा से जोड़ा जा रहा है, लेकिन इससे तनाव और बढ़ सकता है।
आगे क्या होगा?
हालांकि अमेरिका ने अपना “फाइनल ऑफर” अभी भी खुला रखा है, लेकिन ईरान के रुख को देखते हुए निकट भविष्य में समाधान मुश्किल नजर आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गतिरोध आगे किसी बड़े भू-राजनीतिक संकट का रूप ले सकता है।