नोएडा में मजदूरों का गुस्सा अब सड़कों पर नजर आ रहा है। लंबे समय से खराब कामकाजी हालात, कम वेतन और छुट्टियों की कमी से परेशान मजदूर अब आंदोलन करने को मजबूर हो गए हैं। मजदूरों का कहना है कि उनके साथ हर स्तर पर अमानवीय व्यवहार हो रहा है।
न सिक लीव, न कैजुअल लीव
मजदूरों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उन्हें बीमारी की छुट्टी (सिक लीव) या सामान्य छुट्टी (कैजुअल लीव) नहीं मिलती। अगर वे किसी कारण से छुट्टी लेते भी हैं, तो उनकी सैलरी से पैसा काट लिया जाता है। ऐसे में उनके लिए परिवार का खर्च चलाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
त्योहारों पर भी नहीं मिलती छुट्टी
एक महिला सफाई कर्मचारी ने बताया कि उसे होली, दिवाली जैसे बड़े त्योहारों पर भी काम करना पड़ता है। उसे सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी की छुट्टी मिलती है। अगर वह त्योहार पर छुट्टी लेती है, तो या तो उसे दूसरी शिफ्ट करनी पड़ती है या सैलरी कट जाती है।
12 घंटे काम, लेकिन वेतन कम
अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के नेता बेचु गिरी के अनुसार, कई जगहों पर मजदूरों से 12 घंटे काम कराया जाता है, जबकि उन्हें 8 घंटे की शिफ्ट के हिसाब से भी पूरा वेतन नहीं मिलता। कई कंपनियों में जहां 3 कर्मचारियों की जरूरत होती है, वहां 2 से ही काम चलाया जाता है, जिससे काम का दबाव और बढ़ जाता है।
ईएसआई सुविधा में भी गड़बड़ी
मजदूरों ने यह भी आरोप लगाया कि कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESI) की सुविधा भी सही तरीके से नहीं मिल रही है। कई मामलों में नियोक्ता पूरी किश्त जमा नहीं करते, जिससे मजदूरों को इलाज के समय परेशानी होती है। यहां तक कि अगर कोई मजदूर ईएसआई का लाभ लेता भी है, तो उसे सिर्फ 70% वेतन ही मिलता है।
नौकरी की सुरक्षा भी नहीं
मजदूरों का कहना है कि उन्हें न अर्न लीव मिलती है, न सीएल और न ही नौकरी की कोई गारंटी है। कम वेतन, ज्यादा काम और असुरक्षित भविष्य ने मजदूरों को आंदोलन के लिए मजबूर कर दिया है।
देशभर में एक जैसी स्थिति
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल नोएडा तक सीमित नहीं है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी मजदूरों की स्थिति लगभग समान है।
आंदोलन क्यों जरूरी?
मजदूरों का कहना है कि जब उन्हें बुनियादी अधिकार—जैसे छुट्टी, उचित वेतन और स्वास्थ्य सुविधा—नहीं मिलते, तो उनके पास आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
निष्कर्ष
नोएडा में मजदूरों का यह आंदोलन केवल एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के श्रमिक वर्ग की पीड़ा को दर्शाता है। अगर जल्द सुधार नहीं हुआ, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।