तेल सस्ता हुआ, लेकिन शिपिंग बनी नई मुसीबत
खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होने के बावजूद भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चुनौती सामने आ गई है। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन तेल लेकर आने वाले जहाजों की कमी के कारण शिपिंग लागत में भारी उछाल आया है।
रिपोर्टों के अनुसार फारस की खाड़ी से भारत तक कच्चा तेल लाने वाले बड़े टैंकरों का किराया सामान्य दर की तुलना में करीब नौ गुना तक बढ़ गया है। इसे वर्ष 2026 की सबसे महंगी बुकिंग में शामिल बताया जा रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की कमी
विशेषज्ञों के मुताबिक मार्च 2026 में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई थी। कई शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाज दूसरे मार्गों पर भेज दिए थे।
हालांकि हाल के दिनों में तनाव कम हुआ है और समुद्री मार्ग फिर खुल गए हैं, लेकिन पर्याप्त संख्या में जहाज उपलब्ध नहीं होने से तेल कंपनियों को ज्यादा किराया चुकाकर टैंकर बुक करने पड़ रहे हैं।
भारत के लिए LPG सप्लाई अहम
भारत अपनी रसोई गैस यानी एलपीजी की जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। अनुमान है कि देश में इस्तेमाल होने वाली लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी होर्मुज मार्ग से होकर आती है।
ऐसे में यदि जहाजों की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो भविष्य में एलपीजी आपूर्ति और आयात लागत पर असर पड़ सकता है। हालांकि अभी तक घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में किसी बदलाव की घोषणा नहीं की गई है।
रूस से रिकॉर्ड तेल आयात कर रहा भारत
ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत ने पिछले कुछ वर्षों में तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। जून 2026 में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
इसके अलावा भारतीय कंपनियां उत्तरी अमेरिका और वेनेजुएला जैसे देशों से भी तेल खरीद रही हैं ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके।
आम लोगों पर क्या पड़ सकता है असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 73 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई है, जिससे कुछ राहत मिली है।
लेकिन यदि जहाजों की उपलब्धता सामान्य नहीं होती और शिपिंग लागत ऊंची बनी रहती है तो तेल कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। आने वाले हफ्तों में हालात सामान्य होने पर पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है, लेकिन फिलहाल ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।