नई परमाणु साझेदारी ने छेड़ी बहस
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए नए परमाणु सहयोग समझौते ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप प्रशासन इसे ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक साझेदारी की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है, जबकि अमेरिकी सांसदों और परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों का एक वर्ग इस समझौते को भविष्य की वैश्विक सुरक्षा के लिए चुनौती मान रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस यूरेनियम संवर्धन को लेकर वर्षों तक ईरान पर दबाव बनाया गया, उसी दिशा में अब सऊदी अरब को सीमित रूप से आगे बढ़ने की अनुमति क्यों दी जा रही है।
क्या है अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौता?
समझौते के तहत सऊदी अरब में भविष्य में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विस्तार के लिए अमेरिकी कंपनियां रिएक्टर निर्माण और तकनीकी सहयोग देंगी। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, यदि यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी जाती है तो प्रक्रिया अमेरिकी निगरानी में होगी और संवेदनशील तकनीक सीधे सऊदी अरब को हस्तांतरित नहीं की जाएगी। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे परमाणु हथियार बनाने की संभावना पर नियंत्रण रखा जाएगा।
क्यों उठ रहे हैं विवाद?
विवाद का सबसे बड़ा कारण यह है कि इस समझौते में सऊदी अरब को कुछ पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्थाओं से छूट देने का प्रस्ताव शामिल है। इसके स्थान पर अमेरिकी विशेषज्ञ निगरानी करेंगे। आलोचकों का कहना है कि इससे वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था कमजोर हो सकती है और भविष्य में अन्य देश भी ऐसी ही छूट की मांग कर सकते हैं।
कांग्रेस और विशेषज्ञों की चिंता
अमेरिकी कांग्रेस के कई सदस्य इस समझौते पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की जगह केवल एक देश की निगरानी होगी तो वैश्विक विश्वास प्रभावित हो सकता है। परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों का भी मानना है कि भविष्य में इससे नई मिसाल बनेगी, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।
ईरान और इजरायल की नजर
विश्लेषकों के अनुसार, यह समझौता ईरान के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। वहीं इजरायल के कुछ पूर्व अधिकारियों और सुरक्षा विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि यदि क्षेत्र में परमाणु कार्यक्रमों का विस्तार हुआ तो पश्चिम एशिया में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। हालांकि अमेरिका का कहना है कि यह समझौता केवल शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तक सीमित रहेगा।
अमेरिकी कंपनियों को मिल सकता है लाभ
समझौते से अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनियों को बड़ा व्यावसायिक लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। विशेष रूप से परमाणु रिएक्टर निर्माण और संबंधित उपकरणों की आपूर्ति में अमेरिकी उद्योग की भूमिका बढ़ सकती है। इससे अमेरिका और सऊदी अरब के बीच आर्थिक सहयोग भी मजबूत होने की उम्मीद है।
आगे क्या होगा?
यह समझौता अब अमेरिकी कांग्रेस के पास समीक्षा के लिए जाएगा, जहां सांसदों को निर्धारित अवधि में इस पर विचार करना होगा। यदि कांग्रेस विरोध करती है, तब भी राष्ट्रपति के पास संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ने के विकल्प मौजूद हैं। फिलहाल यह मुद्दा अमेरिका, पश्चिम एशिया और वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।