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UAE को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ देगा भारत? दिल्ली में डील डन, पाकिस्तान–सऊदी अरब होंगे बेचैन

HighLights

  • भारत–UAE के बीच एडवांस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी पर अहम समझौता
  • ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ को लेकर अटकलें तेज
  • पाकिस्तान और सऊदी अरब में बढ़ी बेचैनी

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली।
India UAE Nuclear Deal: क्या भारत अब यूएई को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ यानी परमाणु सुरक्षा कवच देने जा रहा है? यह सवाल तब से चर्चा में है, जब यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते हुए। इन समझौतों में न्यूक्लियर सेफ्टी और ऑपरेशन से जुड़ी डील सबसे ज्यादा सुर्खियों में है, जिसने पाकिस्तान और सऊदी अरब की चिंता बढ़ा दी है।

पीएमओ की ओर से जारी बयान के मुताबिक, भारत और यूएई एडवांस न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी पर मिलकर काम करेंगे। इसमें स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR), एडवांस रिएक्टर सिस्टम, न्यूक्लियर पावर प्लांट ऑपरेशन और मेंटेनेंस शामिल हैं। खास तौर पर ‘न्यूक्लियर सेफ्टी’ शब्द ने इस समझौते को लेकर कई तरह की अटकलों को जन्म दिया है।

न्यूक्लियर सेफ्टी बनाम न्यूक्लियर अंब्रेला

तकनीकी तौर पर न्यूक्लियर सेफ्टी का मतलब परमाणु संयंत्रों को चर्नोबिल या फुकुशिमा जैसे हादसों से बचाना, रेडिएशन लीक रोकना और परमाणु कचरे का सुरक्षित निपटान करना होता है। यूएई के पास बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट है, जबकि भारत को 50 साल से ज्यादा का सुरक्षित न्यूक्लियर ऑपरेशन का अनुभव है। ऐसे में भारत यूएई को तकनीकी सहयोग दे सकता है।

वहीं, ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ का अर्थ होता है एक्सटेंडेड डिटरेंस—यानी किसी तीसरे देश के परमाणु हमले की स्थिति में अपने परमाणु हथियारों से सहयोगी देश की रक्षा करना। मौजूदा समझौते की भाषा से साफ तौर पर यह संकेत नहीं मिलता कि भारत यूएई को ऐसा सुरक्षा कवच देने जा रहा है।

क्या भारत UAE को न्यूक्लियर अंब्रेला दे सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करना भारत के लिए आसान नहीं है। भारत की ‘नो फर्स्ट यूज’ नीति कहती है कि वह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल पहले नहीं करेगा। न्यूक्लियर अंब्रेला देने का मतलब इस नीति में बदलाव करना होगा। इसके अलावा, यूएई की सुरक्षा फिलहाल अमेरिका के जिम्मे है और वहां अमेरिकी सैन्य अड्डे भी मौजूद हैं, जिससे यह मामला और जटिल हो जाता है।

पाकिस्तान–सऊदी फैक्टर क्यों अहम?

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच कथित न्यूक्लियर सहयोग की चर्चाएं पहले से मौजूद हैं। इसी वजह से भारत–UAE डील को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के नजरिये से देखा जा रहा है। हालांकि भारत की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति पाकिस्तान से अलग है और वह अपनी परमाणु संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा।

असल मायने क्या हैं इस डील के?

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यह समझौता ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ से ज्यादा एनर्जी सिक्योरिटी और टेक्नो-डिप्लोमेसी से जुड़ा है। भारत यूएई को स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स और न्यूक्लियर सेफ्टी सॉल्यूशंस उपलब्ध कराकर मध्य पूर्व में चीन की बढ़ती दखलअंदाजी को चुनौती देना चाहता है। साथ ही यूएई भी तेल पर निर्भरता कम कर ग्रीन एनर्जी की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

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