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दिल्ली में जनता से फिर जनादेश लिया जाए… शराब पॉलिसी केस में केजरीवाल- सिसोदिया बरी हुए तो तेजस्वी ने चुनाव की मांग उठाई

नई दिल्ली/पटना | 28 फरवरी 2026

दिल्ली की राजनीति में बड़ा मोड़ तब आया जब Rouse Avenue Court ने दिल्ली आबकारी (शराब) नीति मामले में मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal और पूर्व उपमुख्यमंत्री Manish Sisodia समेत 23 आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध नहीं हैं और जांच में कई कमियां पाई गईं।

इस फैसले के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बहस तेज हो गई है। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav ने बड़ा बयान देते हुए दिल्ली में दोबारा विधानसभा चुनाव कराने की मांग की है। उनका कहना है कि अब फैसला “जनता की अदालत” में होना चाहिए।

क्या कहा कोर्ट ने?

राउज एवेन्यू कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं मिले। कोर्ट ने जांच एजेंसी Central Bureau of Investigation (CBI) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और कहा कि आरोप कमजोर आधार पर टिके थे।

यह फैसला दिल्ली की राजनीति के साथ-साथ केंद्र और विपक्ष के रिश्तों पर भी असर डाल सकता है।

तेजस्वी यादव का हमला

फैसले के बाद प्रेसवार्ता में तेजस्वी यादव ने केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है।

तेजस्वी ने कहा कि यदि इतने गंभीर आरोप अदालत में साबित नहीं हो पाए, तो अब जनता से नया जनादेश लेना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि यह मामला राजनीतिक साजिश का उदाहरण है और इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं।

दिल्ली में दोबारा चुनाव की मांग

तेजस्वी यादव ने स्पष्ट कहा कि दिल्ली में दोबारा विधानसभा चुनाव होने चाहिए, ताकि जनता स्वयं तय करे कि वह किसके साथ खड़ी है। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का होता है, और जब अदालत ने आरोपों को खारिज कर दिया है, तो राजनीतिक रूप से भी जनता की राय लेना जरूरी है।

हालांकि, चुनाव आयोग या केंद्र सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन इस बयान ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

राजनीतिक असर क्या होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने वाला मुद्दा बन सकता है। विपक्ष इसे राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण बता रहा है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष अपने रुख पर कायम है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या दिल्ली में दोबारा चुनाव की मांग राजनीतिक दबाव बनाती है या मामला यहीं थम जाता है।

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