भारत सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाते हुए डीजल और एटीएफ (एविएशन टरबाइन फ्यूल) पर निर्यात शुल्क में भारी बढ़ोतरी कर दी है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार अब डीजल पर निर्यात शुल्क 21.5 रुपये से बढ़ाकर 55.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है, जबकि ATF पर यह 29.5 रुपये से बढ़कर 42 रुपये प्रति लीटर हो गया है।
इस फैसले का मुख्य उद्देश्य घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना है, ताकि वैश्विक संकट के बावजूद देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कमी न हो।
घरेलू बाजार को प्राथमिकता देने की रणनीति
सरकार का यह कदम साफ संकेत देता है कि वह पेट्रोलियम कंपनियों को निर्यात से ज्यादा घरेलू बाजार को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करना चाहती है। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति में बाधा और बढ़ती कीमतों के बीच यह निर्णय लिया गया है।
अधिकारियों के अनुसार, यह फैसला राजस्व बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि देश में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने के लिए लिया गया है।
वैश्विक संकट का असर
हाल के समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े तनाव के कारण। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे विवाद के चलते वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है, जिसका असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ सकता है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता चिंता का विषय
भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल और 60% गैस आयात करता है। ऐसे में वैश्विक संकट का सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। हालांकि सरकार का दावा है कि देश में फिलहाल पर्याप्त भंडार मौजूद है और घरेलू आपूर्ति पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
निजी कंपनियों पर पड़ेगा असर
इस फैसले का सीधा असर निजी रिफाइनरी कंपनियों, खासकर रिलायंस इंडस्ट्रीज पर पड़ेगा, जो भारत से बड़े पैमाने पर पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करती है। निर्यात शुल्क बढ़ने से कंपनियों की लागत बढ़ेगी और मुनाफा कम होगा। इससे कंपनियां निर्यात घटाकर घरेलू बाजार में अधिक उत्पाद बेचने के लिए मजबूर हो सकती हैं।
तेल कंपनियों का घाटा और सरकार की चिंता
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल पर भारी अंडर-रिकवरी झेल रही हैं। ऐसे में यह आशंका थी कि कंपनियां नुकसान की भरपाई के लिए निर्यात बढ़ा सकती हैं। सरकार ने इस कदम के जरिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि घरेलू बाजार में ईंधन की कमी न हो।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक संकट लंबा चलता है, तो सरकार आगे भी ऐसे कदम उठा सकती है। फिलहाल यह फैसला देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।