राष्ट्रीय

रानी लक्ष्मीबाई जयंती: पीएम मोदी ने श्रद्धांजलि दी, कहा—“1857 की वीरांगना का साहस हर भारतीय को प्रेरित करता है

रानी लक्ष्मीबाई जयंती

एजेंसी। रानी लक्ष्मीबाई की जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की इस वीरांगना को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई का साहस, पराक्रम और मातृभूमि के सम्मान के लिए उनका अमिट संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा। प्रधानमंत्री ने बुधवार सुबह ‘एक्स’ पर एक पोस्ट कर लिखा, “मां भारती की अमर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई को उनकी जयंती पर आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। आजादी के पहले संग्राम में उनकी वीरता और पराक्रम की कहानी आज भी देशवासियों को जोश और जुनून से भर देती है। मातृभूमि के स्वाभिमान की रक्षा के लिए उनके त्याग और संघर्ष को कृतज्ञ राष्ट्र कभी भुला नहीं सकता।”

रानी लक्ष्मीबाई, जिन्हें झांसी की रानी के नाम से पूरे विश्व में जाना जाता है, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रमुख और सशक्त नेताओं में से थीं। एक महिला होते हुए भी जिस साहस, युद्धकौशल और नेतृत्व क्षमता का परिचय उन्होंने दिया, वह भारतीय इतिहास में अमर है। ब्रिटिश शासन की कठोर नीतियों के खिलाफ उठ खड़े होने और अपनी धरती की रक्षा के लिए दृढ़ निश्चय के साथ लड़ने के कारण वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गईं।

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में मराठा ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका तांबे था और लोग उन्हें प्रेम से “मनु” कहते थे। उनके पिता मोरोपंत तांबे पेशवा बाजीराव द्वितीय के सत्ता-केन्द्र बिठूर में कार्यरत थे। बचपन में ही उनकी मां का निधन हो गया था, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके पिता ने किया। मनु अत्यंत स्वतंत्र स्वभाव की थीं और अन्य लड़कियों की तुलना में अधिक शिक्षित व साहसी थीं। उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी, धनुर्विद्या जैसी युद्ध-कला में भी दक्षता प्राप्त की।

साल 1842 में मनु का विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ, जिसके बाद वे लक्ष्मीबाई के नाम से जानी गईं। विवाह के कुछ वर्षों बाद जब महाराजा का निधन हुआ, तब अंग्रेजों ने अपनी ‘हड़प नीति’ यानी डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स का हवाला देते हुए झांसी पर अधिकार करने की कोशिश की। रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की इस नीति को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और झांसी की रक्षा के लिए संकल्प लिया।

1857 के विद्रोह के दौरान रानी लक्ष्मीबाई झांसी की जनता की नेता बनकर उभरीं। उन्होंने अपने सशक्त नेतृत्व और असाधारण युद्धकौशल से ब्रिटिश सेना का डटकर सामना किया। कहा जाता है कि उन्होंने अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधकर युद्धभूमि में तलवारें चलाते हुए अंग्रेजों को भारी क्षति पहुँचाई। उनकी वीरता की गूंज उस समय देश से लेकर विदेशों तक सुनाई पड़ी।

हालांकि भारी संघर्ष के बावजूद रानी लक्ष्मीबाई ने 1858 में ग्वालियर के निकट ब्रिटिश सेना से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त कर ली, लेकिन मरते दम तक उन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। उनके साहस, बलिदान और संघर्ष की गाथा आज भी भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में शामिल है।

रानी लक्ष्मीबाई जयंती 2025 के अवसर पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को याद किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर विभिन्न नेताओं और नागरिकों ने इस महान वीरांगना को नमन करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प व्यक्त किया। रानी लक्ष्मीबाई का जीवन मातृभूमि के प्रति प्रेम, दृढ़ता, नारी-शक्ति और स्वतंत्रता की भावना का ऐसा प्रेरक उदाहरण है जो सदियों तक भारतीयों को प्रेरित करता रहेगा।

Related posts

Crude Oil Price: 107 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल, मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच क्या भारत में बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

News Author

कनाडा में फायरिंग के बाद कॉमेडियन Kapil Sharma को कथित धमकी!

News Author

महिला आरक्षण बिल गिरा! अब सड़क पर NDA vs विपक्ष—देशभर में बड़ा आंदोलन!

News Author

Leave a Comment