DGP राजीव कृष्ण सख्त, तीन दिन में मांगी विस्तृत रिपोर्ट
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में जनशिकायतों के निस्तारण में लापरवाही को लेकर पुलिस मुख्यालय ने सख्त रुख अपनाया है। पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कृष्ण ने 9 जिलों के 10 थानाध्यक्षों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, जनसुनवाई और शिकायतों के समाधान में लापरवाही सामने आने के बाद यह कदम उठाया गया। संबंधित जिलों से तीन दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी गई है।
पुलिस मुख्यालय की ओर से 27 अक्टूबर 2026 को जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, डीजीपी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ जनशिकायतों के निस्तारण की समीक्षा की। बैठक में शिकायतों का समयबद्ध और पारदर्शी समाधान सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
किन जिलों के थानाध्यक्षों पर हुई कार्रवाई?
रिपोर्ट के अनुसार, कार्रवाई की जद में लखनऊ के बाबू बनारसी दास थाने के प्रभारी के अलावा खीरी, उन्नाव, एटा, आगरा, प्रतापगढ़, बदायूं, बिजनौर और मथुरा के थानाध्यक्ष शामिल हैं। इन 9 जिलों के कुल 10 थानाध्यक्षों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
थाने और चौकी स्तर पर शिकायतों के समाधान पर जोर
डीजीपी ने निर्देश दिया कि शिकायतकर्ताओं को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए बार-बार जिला मुख्यालय या पुलिस मुख्यालय के चक्कर न लगाने पड़ें। थाने और चौकी के स्तर पर ही शिकायतों को गंभीरता से सुनकर उचित कार्रवाई की जाए।
बैठक में यह भी कहा गया कि आईजीआरएस, जनसुनवाई, मुख्यमंत्री संदर्भ, पीजी पोर्टल और अन्य माध्यमों से मिलने वाली प्रत्येक शिकायत को प्राथमिकता के आधार पर सुना जाए। किसी भी शिकायत को दर्ज करने से मना नहीं किया जाना चाहिए।
स्थानीय विवादों और संवेदनशील मामलों पर भी नजर
पुलिस अधिकारियों को भूमि विवाद और अन्य स्थानीय मामलों में संबंधित विभागों के साथ समन्वय बनाकर काम करने के निर्देश दिए गए। संवेदनशील मामलों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और शिकायतों का पारदर्शी तरीके से निस्तारण करने पर भी जोर दिया गया।
जवाबदेही तय करने का संदेश
इस कार्रवाई के जरिए पुलिस मुख्यालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जनशिकायतों की अनदेखी को गंभीरता से लिया जाएगा। अब संबंधित जिलों से मांगी गई रिपोर्ट और विभागीय प्रक्रिया के आगे बढ़ने पर कार्रवाई से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी सामने आ सकती है।
नोट: रिपोर्ट में थानाध्यक्षों के खिलाफ निलंबन का उल्लेख है, जबकि उद्धृत आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में “प्रत्यावर्तित” किए जाने और विभागीय कार्रवाई के निर्देश का जिक्र है। प्रकाशन से पहले आधिकारिक आदेश से कार्रवाई की सटीक प्रकृति की पुष्टि करना उचित होगा।