महाराष्ट्र | मौसम और कृषि संकट | 28 सितंबर 2026
महाराष्ट्र में कमजोर मानसून ने गंभीर सूखे की स्थिति पैदा कर दी है। राज्य के 358 में से 265 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने के बाद करीब 74 प्रतिशत क्षेत्र सूखे की चपेट में आ गया है। मराठवाड़ा, विदर्भ और उत्तरी महाराष्ट्र के कृषि क्षेत्रों में बारिश की भारी कमी से खरीफ की फसलों पर संकट गहरा गया है। लगातार बारिश में गिरावट और लंबे समय तक सूखा रहने के कारण किसानों को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
महाराष्ट्र में इस बार मानसून की बारिश सामान्य से करीब 18.8 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। राज्य में सामान्य 970.9 मिलीमीटर के मुकाबले लगभग 798.2 मिलीमीटर बारिश हुई। कमजोर मानसून के साथ अल नीनो के प्रभाव और बारिश के लंबे अंतराल ने जल संकट को और गंभीर बना दिया है।
265 तहसीलों में सूखे की स्थिति, 74 प्रतिशत क्षेत्र प्रभावित
महाराष्ट्र सरकार ने 26 सितंबर 2026 को राज्य की 265 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया। इसका असर राज्य के चार प्रमुख प्रशासनिक क्षेत्रों—विदर्भ, मराठवाड़ा, उत्तरी महाराष्ट्र और पुणे संभाग में देखने को मिल रहा है।
यवतमाल जिले की 16 तहसीलें, जलगांव की 15 तहसीलें और अहिल्यानगर, नागपुर, अमरावती तथा नांदेड़ की 14-14 तहसीलें प्रभावित बताई गई हैं। कई क्षेत्रों में सामान्य से 50 से 60 प्रतिशत तक कम बारिश होने के कारण खेती और पेयजल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है।
17 सप्ताह तक बारिश की कमी से फसलें प्रभावित
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रही। कई इलाकों में बारिश के बीच 40 से 60 दिनों तक का सूखा अंतराल दर्ज किया गया। इससे वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
सोयाबीन, कपास और अरहर जैसी प्रमुख खरीफ फसलों पर इसका असर पड़ा है। किसानों ने बुवाई के लिए बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी पर निवेश किया था, लेकिन फसल के विकास के महत्वपूर्ण समय में पर्याप्त बारिश नहीं होने से उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
कमजोर मानसून और अल नीनो ने बढ़ाई परेशानी
मौसम की अनियमितता को इस संकट का प्रमुख कारण बताया जा रहा है। मानसून के दौरान कम बारिश के साथ लंबे शुष्क अंतराल ने मिट्टी की नमी और जल स्रोतों पर असर डाला है। अल नीनो की परिस्थितियां भी मानसून के व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं, हालांकि सूखे की गंभीरता के लिए स्थानीय मौसम, वर्षा वितरण और जल प्रबंधन जैसे कई कारक जिम्मेदार होते हैं।
25 साल का सबसे गंभीर जल संकट, 1972 के सूखे से हो रही तुलना
महाराष्ट्र में 2026 के सूखे को पिछले 25 वर्षों के सबसे गंभीर संकटों में से एक बताया जा रहा है। इसकी तुलना 1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी की जा रही है। हालांकि, दोनों वर्षों की परिस्थितियां अलग-अलग थीं। इस बार किसानों ने खरीफ की बुवाई और फसल तैयार करने में निवेश किया, लेकिन बारिश की कमी के कारण उनकी लागत और संभावित आमदनी पर असर पड़ा है।
किसानों के लिए 12 राहत उपायों की घोषणा
सूखे से प्रभावित किसानों और ग्रामीण परिवारों को राहत देने के लिए राज्य सरकार ने 12 उपायों की घोषणा की है। इनमें फसल ऋण का पुनर्गठन, कृषि ऋणों की वसूली पर रोक और भू-राजस्व में छूट जैसे कदम शामिल हैं।
इसके अलावा, प्रभावित किसानों के बिजली बिलों में राहत, बच्चों की स्कूल फीस में छूट, टैंकरों के माध्यम से पेयजल आपूर्ति और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था जैसे उपाय भी घोषित किए गए हैं। ग्रामीण रोजगार योजनाओं के तहत रोजगार उपलब्ध कराने और फसल नुकसान का तकनीक के जरिए आकलन करने की भी बात कही गई है।
जल संकट के बीच विकास परियोजनाओं पर सवाल
महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति के बीच जल संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। विपक्षी कांग्रेस ने ठाणे जैसे क्षेत्रों में प्रस्तावित डेटा सेंटर परियोजनाओं में पानी की खपत को लेकर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि जल संकट के दौरान किसानों और आम नागरिकों की पेयजल जरूरतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अगले दो साल तक रह सकता है असर
कम बारिश, भूजल स्तर पर दबाव और फसल उत्पादन में संभावित गिरावट के चलते इस संकट का असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक रह सकता है। प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल, पशुओं के चारे और किसानों की आर्थिक स्थिति को लेकर चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
फिलहाल महाराष्ट्र में सूखे से निपटने के लिए राहत उपायों और फसल नुकसान के आकलन पर ध्यान दिया जा रहा है। आने वाले समय में बारिश की स्थिति, जल स्रोतों की उपलब्धता और राहत सहायता का प्रभाव यह तय करेगा कि राज्य इस संकट से कितनी जल्दी उबर पाता है।