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थोक महंगाई दर 11.39% पर पहुंची, ईंधन से लेकर फैक्ट्री के सामान तक बढ़ीं कीमतें

अगस्त में 9.92% थी थोक महंगाई, सितंबर में खुदरा महंगाई भी बढ़कर 5.54% हुई; बढ़ती लागत का असर आम लोगों के बजट पर पड़ने की आशंका

नई दिल्ली। देश में महंगाई का दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। सितंबर 2026 में थोक महंगाई दर बढ़कर 11.39% पर पहुंच गई, जबकि अगस्त में यह 9.92% थी। जारी आंकड़ों के मुताबिक, ईंधन, बिजली, खाद्य पदार्थों और फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान की कीमतों में तेजी ने थोक महंगाई को ऊपर पहुंचाया। इससे पहले खुदरा महंगाई दर भी अगस्त के 4.83% से बढ़कर सितंबर में 5.54% हो गई थी। थोक और खुदरा महंगाई में एक साथ बढ़ोतरी के बीच अब आम लोगों के घरेलू बजट, कारोबारियों की लागत और भारतीय रिजर्व बैंक के अगले फैसलों पर नजर रहेगी।

ईंधन और बिजली की कीमतों ने बढ़ाया दबाव

सितंबर में ईंधन और बिजली से जुड़ी महंगाई दर बढ़कर 25.85% हो गई, जबकि अगस्त में यह 22.93% थी। कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की महंगाई दर 34.4% से बढ़कर 57.3% पहुंच गई। खनिज तेल की महंगाई दर 40% रही, जो अगस्त में 38.5% थी। वहीं, कोयले और लिग्नाइट की महंगाई दर 1.6% से बढ़कर 9.3% हो गई। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवहन, उत्पादन और दूसरे औद्योगिक खर्चों पर भी पड़ सकता है।

खाद्य पदार्थों की महंगाई भी बढ़ी

आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में थोक खाद्य सूचकांक की महंगाई दर बढ़कर 8.66% हो गई, जबकि अगस्त में यह 7.05% थी। प्राथमिक खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर भी 5.7% से बढ़कर 8.1% पहुंच गई। हालांकि, तैयार खाद्य उत्पादों की महंगाई दर अगस्त के 9.7% से घटकर सितंबर में 9.4% रही। खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवारों के मासिक खर्च पर दबाव बढ़ सकता है। सब्जियों, खाद्य तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें घरेलू बजट को सीधे प्रभावित करती हैं।

फैक्ट्रियों में तैयार होने वाला सामान भी महंगा

सितंबर में विनिर्मित उत्पादों की थोक महंगाई दर अगस्त के 8.37% से बढ़कर 9.76% हो गई। बुनियादी धातुओं की महंगाई दर 10.9% से बढ़कर 17% पहुंच गई, जबकि रसायनों और उनसे बने उत्पादों की महंगाई दर 14.3% से बढ़कर 16.7% हो गई। इन वस्तुओं का इस्तेमाल निर्माण, मशीनरी और कई औद्योगिक क्षेत्रों में होता है। कीमतें बढ़ने पर कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर कुछ तैयार उत्पादों के दामों पर भी पड़ सकता है, हालांकि वास्तविक असर कंपनियों की लागत और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

आम लोगों की जेब पर कैसे पड़ सकता है असर

थोक महंगाई में बढ़ोतरी का अर्थ यह नहीं है कि सभी वस्तुओं के खुदरा दाम तुरंत बढ़ जाएंगे। लेकिन यदि कंपनियों को कच्चे माल, बिजली, ईंधन और परिवहन पर अधिक खर्च करना पड़ता है, तो वे इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं। ऐसे में रोजमर्रा के सामान, निर्माण सामग्री और अन्य उत्पाद महंगे होने की आशंका बनी रहती है। वहीं, खाद्य पदार्थों की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी परिवारों के खर्च को सीधे प्रभावित कर सकती है। आने वाले महीनों में कीमतों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि ऊर्जा और खाद्य वस्तुओं की लागत में कितना बदलाव आता है।

आरबीआई के फैसलों पर रहेगी नजर

थोक और खुदरा महंगाई में बढ़ोतरी के बीच भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर ध्यान बना हुआ है। केंद्रीय बैंक ब्याज दरों से जुड़े फैसले लेते समय महंगाई के साथ आर्थिक विकास, मांग और अन्य आर्थिक परिस्थितियों का भी आकलन करता है। इसलिए थोक महंगाई में तेजी आने का मतलब यह नहीं है कि रेपो दर में तत्काल बढ़ोतरी होगी। आगे की नीति इस बात पर निर्भर करेगी कि महंगाई कितनी स्थायी रहती है और उसके भविष्य के अनुमान क्या संकेत देते हैं।

महंगाई की दिशा तय करेंगे आने वाले आंकड़े

सितंबर के आंकड़ों में ईंधन, खाद्य वस्तुओं और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी प्रमुख रूप से सामने आई है। अब आने वाले महीनों के महंगाई आंकड़े यह स्पष्ट करने में मदद करेंगे कि कीमतों का दबाव अस्थायी है या लंबे समय तक बना रह सकता है। आम उपभोक्ताओं, कारोबारियों और निवेशकों के लिए महंगाई की दिशा महत्वपूर्ण रहेगी, क्योंकि इसका असर खर्च, उत्पादन और आर्थिक फैसलों पर पड़ सकता है।

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